आँडीओ कँसेट,तथा व्हीडीओ सीडीज.

आँडीओ कँसेट,तथा व्हीडीओ सीडीज.

गुरु महाराज के बाणीजीके कही भाग के सत्संग की आँडीओ कँसेट,तथा व्हीडीओ सीडीज
तयार है। वैसेही कही पदोंकी गायनकी आँडीओ कँसेट भी उपलब्ध है।

॥राम राम सा॥

 

भक्ती और केवलकी भक्ती

भक्ती और केवलकी भक्ती

आदि सतगुरू,सर्व आत्माओं के सतगुरू,सर्व सृष्टी के सतगुरू,
॥ सतगुरू सुखरामजी महाराजने ॥
धन्य हो,धन्य हो,धन्य हो.
आदि सतगु्रू,सर्व आत्माओं के सतगुरू
सर्व सृष्टी के सतगुरू सतगुरू
सुखरामजी महाराजकी
अंनत हंसो को तारनेवाली
अगम देश की अनभे वाणी
भाषांतर कर्ता :- सतगुरू राधकिसनजी महाराज,(राधाकिसनजी माहेश्वरी )
(ग्राम-हिवरा (लाहे), ता. कारंजा (लाड),जि. अकोला.)
॥ राम रामसा.॥
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आदि सतगुरू,सर्व आत्माओं के सतगुरू,सर्व सृष्टी के सतगुरू,
॥ सतगुरू सुखरामजी महाराजने ॥
धन्य हो,धन्य हो,धन्य हो.
॥सतस्वरुपी राम॥
॥प्रस्तावना॥
यूं जग मोहे न जाणे बांदा, यूं जग मोहे न जाणे ओ।
अगम देश का मै उपदेशी, ये माया रस माने हो॥

आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,  इसतरहसे ये जगत मुझे पहेचानती नही, क्योंकी मै “अगम”(जिसकी किसिको गम नही।) देशका उपदेश करनेवाला है। अगम का मतलब,वो सतस्वरुप का देश,जो कल भी था।आज भी है, और कल भी रहेंगा।य ये ऐसा अगम का देश है,जिसकी ब्रम्हा,विष्णू,महेश,शक्ती और पारब्रम्ह इन सबको उसकी वार-पार नही। मै तुम्हे सतस्वरुप पारब्रम्हकी बात कर रहा हूँ। और अगर आप लोग उसे शब्दमे पारब्रम्ह समज रहे,तो फ़िर वो “होणकाल पारब्रम्ह” है। परात्परी परमात्मासे यह दो पद शुरुसे चलते आये है। दोनो पद अमर है। एक “होणकाल पारब्रम्ह”और दुसरा “सतस्वरुप पारब्रम्ह”। होणकाल पारब्रम्ह का मतलब जो जो होनेवाला है,वो तो होयेगाही। इस होणकाल पारब्रम्ह को इस जगतमे सभी लोग जानते है,लेकीन वो सतस्वरुप पारब्रम्ह को यह जगत जानती नही। होणकाल पारब्रम्ह की व्याप्ती तो इस प्रकारकी है।(तीन लोक – स्वर्ग लोक,मृत्यु लोक,पाताल लोक,और १४ भुवन – भुर,भुवर,स्वर,महर,जन,तप,सत,तल,अतल,वितल, सुतल,तलातल,रसातल,महातल, तीन ब्रम्ह – चिदानंद ब्रम्ह,शिव ब्रम्ह,पारब्रम्ह और १३ लोक – महामाया,प्रकृती,ज्योती,अजर,आनंद,वजर, इखर,निरंजन,निराकार,शिवब्रम्ह,महाशुन्य,शुन्यसागर,परब्रम्ह)इसके सिवाय ब्रम्ह का सतलोक,शंकर का कैलास,विष्णू का वैकुंठ, और वैकुंठ के परे शक्ती का देश है। ये सब होणकाल पारब्रम्ह का पसारा है। इसे जगतके लोग जानते है।
सतगुरू सुखरामजी महाराज कह्ते है,वो अगम देश को (सतस्वरुप देश)ये जगत जानते नही। क्योंकी ये जगत “माया रस”(माया का सुख) को मानती है। सतस्वरुप ये वैरागरुप है। ये होणकाल पारब्रम्ह तो मायेसे ओतप्रोत भरा है। और ये जगत तो मायाका “भोगी”है,इसलिए मेरा उपदेश ये समझते नही। अब ये माया कहा तक है, ये सतगुरू सुखरामजी महाराज बताते है,
तीन लोक लग माया हे किची, और शक्त लग भाई।
वहा लग ग्यान कथे सोई काचा, मत मानो जुग माई॥

ये ‘माया’ तीन लोक और उसके आगे ‘शक्ती लोक’तक फ़ैली है। इसेही ‘त्रिगुणी माया’कहते है।और ये जगत इसके पीछे पच-पचके मर रहा है।इस माया के सुखमेही दु:ख भरा है।इसलिए ये माया के सुखमे आजतक कोइभी तृप्त नही हुआ। फ़िरभी ये जगत मायाकी भक्ती और निर्गुण ब्रम्ह(होणकाल पारब्रम्ह) भक्तीमे फ़ंसे है।थोडे बहोत ज्ञानी होणकाल पारब्रम्ह तक पहुंचे,लेकीन उनको भी क्या मिला? ये जो पाच इंद्रियोंकी सुखकी चाहना के लिए ये जीव होणकाल पारब्रम्हसे आया है, फ़िर वापीस वही जा के पहुचा,इसका मतलब, पुनरपी जन्मम पुनरपी मरणम,पुनरपी जननी जठ्रे शयनम। ये जगतके लोग कहेते है,सब नदीयाँ (भक्ती) आखीरमे समुदंरमे ही (पारब्रम्ह)मिलती है। लेकिन वहाँसे वापीस आना नही होता क्या? वहाँसे तो ही आना-जाना है। (लक्ष चौर्याएशी योनीमे घुमना है।)जैसे सुरजके तापसे समुदंरके पानीकी वाफ़ होके मेघ बनते है। मेघसे पानी बरसता है। यही पानी नदीसे समुदंर तक आता है।
इसतरह ये पारब्रम्हतक पहुचे हुये जीव वापीस इस जगतमे आतेही है। क्योंकी ये सृष्टी तो पारब्रम्हकी खेती है। (जैसे किसान खेती करता है,खेतीको मशागत करता, अनाज बोता है,फ़ंसलकी रक्षा करता है,फ़िर फ़ंसल काटता है।)वो सृष्टीकी रचना करता है। महाप्रलयमे इस जगतको अपनेमे विलीन कर लेता है। तब ये तीन लोक,चवदा भुवन,सुरज,चांद,पांच तत्त्व इन सबका प्रलय हो जाता है। इस समय नरक का ‘किडा’से लेकर वैकुंठ्का राजा(विष्णू)तक सब महाप्रलयमे होणकाल पारब्रम्हमे मिल जाते है।फ़िर जब मालिक की इच्छा होती है,तब वापीस वो सृष्टीरचना करता है।फ़िर उस समयमे ये सब जीव अपने अपने कर्म के अनुसार जन्म लेते है।इसलिए फ़िर ऎसे जगह जानेमे क्या मतलब है?और ऎसे जगह (पारब्रम्ह)जाने के लिए वेद,पुराण,शास्र इसमे जो ‘करणी’बतायी है,
वो करो ,इस शरीर को कष्ट दो,फ़िर वो ब्रम्हमे(पारब्रम्ह)जा के मिलो।और वहासे लक्ष चौर्याशी योनीमे फ़िर घुमो। आजतक जिसनेभी’करनी’की , वो कहाँ गये?
वो मोक्षमे गये क्या? मोक्षमे जानेकी तो, ये निशानी है, की वो तीन लोकमे दिखते नही। मोख मिलन की आ से नाणी,तीन लोक मे रहे न प्राणी। इसलिए सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,की उस अगम देश मे चलो।वहा सब ‘सतसुख’,’अनंत सुख’ अनंत युगोतक बिना कष्टसे मिलते है। इसलिए सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,
चार जुगमे केवल भक्ती,मे हंस आण जगायारे।
सब हंस लेर मिलुंगा गुरूसु,आणंदपद मे भायारे॥
मै चार जुगमे आया और अनंत कोटी हंस(जीव)को वो देशमे लेके गया। अब इस कलजुगमे,
कलजुग माय कबीर नामदेव, दादू दरिया सोई।
वा परताप बहोत ने पायो,कहा लग कहु मै तोई॥
आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,इस कलजुगमे संत कबीरजी,संत नामदेवजी,संत दादुजी,संत दर्यावजी,संत राकाजी,संत पीपाजी,संत प्रेमदासजी, संत संतदासजी, संत नानकजी और ऎसे कही संत परमपदमे गये है।और ये सब संतोने वेद,पुराण मे बतायी ‘करनी’ धारण नही की।
आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,
जे आ मुगत बेद पढ होवे,ब्रम्हा ध्यान धरे क्या जोवे।
अगर वेद मे मुक्ती होती,तो ब्रम्हा किसका ध्यान धरके बैठा है?विष्णू किसका ध्यान कर रहा है?शंकर किसका जाप कर रहा है?इसलिए ऎसा’कैवल्य राम’का
सब जाप करो।
आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,
भरमावण कु से कुल जुग हे,समझावे जन बिरला।
छुछुम बेद के भेद बिनारे,सबमाया का किरला॥
माया और ब्रम्ह का भेद विरला संतही बताता है।वो दुधका दुध और पानीका पानी अलग करके बताता है। ये जगत तो भ्रमके लियेही है।वेद शास्र,पुराणमे बतायी करणी करो और कर्म बांधो।
फ़िर कर्म भोगनेके लिये लक्ष चौर्याशी योनीमे आवो।ये सब ताप(आधि,व्याधि,उपाधि/संचित कर्म,प्रारब्ध कर्म,क्रियमाण कर्म)अगर मिटाना चाहते हो, तो वो ‘बावन्न अक्षर’के आधारसे मिटनेवाला और कटनेवाला भी नही। क्योंकी परमात्मा तो बावन्न अक्षरतीत नही है। वो तो ने:अक्ष्रर है।अक्षरातीत है। वही परमात्मके निजनाम है। ऎसे वो ने:अक्षर निजनामके ‘निजमन’देके स्मरण करनेसे परमात्माका ‘निजनाम’ प्रकट होता है।और वो ‘बंकनालसे पुरबके छ: कमल(कंठ,ह्रुदय,मध्य,नाभी,लिंग,गुदा)और पश्चिमके छ:(बंकनाल,मेरुस्थान,त्रिगुटी,चिदानंद,शिवब्रम्ह,पारब्रम्ह)ऎसे बाराह कमलके
छेदन करके दसवे द्वारसे बाहर इस हंस(जीव)को साथमे लेकर अखंड हो जाता है।
इसीको आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज ‘कुद्र्तकला’कहते है।


के सुखराम समझरे प्राणी,सत्त कला ज्यां जागे।
अखंड घट मे हुवो उजियाला,नखचख मे धुन लागे॥
कुद्रत कला नाम इस ही को,कोइ जन जाणे नाही।
करणी बिना क्रिया बिन साजन,उलट आद घर जाही॥
नखचख माय अखंड धुन लागे,निमिष न खंडे कोई।
मुख सु कह्या रित नही आवे,वा कुद्रत सुण होई॥
आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है कि,यही वो परमपद्की भक्ती है। इस जगतमे तीन प्रकारकी भक्ती है,एक सगुणकी,दुसरी निर्गुणकी और तिसरी आनंदपद की(सतस्वरुपकी)। सगुण, निर्गुण को ये जगत जानती है, लेकिन आनंद पद की भक्तीको नही जानती।
आनंद पद की भक्त बताऊ,प्रथम तो मत आवे।
ज्ञान ध्यान हद का गुरू सारा,सो सबही छिट्कावे॥
जब हंस ये भक्ती धारण करता है,तब उसकी मती ऎसी होती है,की वो ‘हद्द्के’गुरू का ज्ञान और ध्यान सब छोड देता है।
सतगुरू शरण ढुढ ले जाई,ज्या नाव कला घट जागे।
राजयोग वो कहिये भाई,बिन करणी धुन लागे॥
इसीको आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज ‘राजयोग’ कहते है।यही अस्सल राजयोग है।
आदि सतगुरूके अधिकारसे कौनसी भी करनी न करते हुये ‘अखंड ध्वनी’लग जाती। इसलिए आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,
मै यो रतन धर्यो है बारे,सुण लिज्यो नर नारी।
के सुखराम काज जीवा की,तो मानो बात हमारी॥

बार बार आ सत्ता न आवे,हंसतारण जुगमाही।
पिछे धरम सकल सोई धरडा,तामे कारज नाही॥

आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज कहते है,ये हंस तारनेकी सत्ता बारबार नही आती,ये कब निकल जायेंगी,ये बात बताई नही जा सकती।

॥राम राम सा॥
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भक्ती का भेद
अंदरका और बाहरका श्वासमे सतस्वरुपी “राम” नामका सुमिरण करना।

सतगुरू सुखरामजी महाराज की ग्रंथ संपदा

सतगुरू सुखरामजी महाराज की ग्रंथ संपदा

गुरु महाराज की बाणीजी चार विभाग मे है। बाणीजीमे दिया हुआ ज्ञान सब
स्वानुभवपे निर्भर है। और कोईभी संत उसे अपनी कसोटी पे जांच सकता है।
यह गुरु महाराज का दावा है।

(१)ग्रंथ :- १ से १८ भाग.

(२)संवाद :- १ से १७ भाग

(३)अंग :- १ से ६६ भाग

(४)पद :- १ से ४२६ भाग

मुल बाणीजी ‘राजस्थान मारवाडी’भाषा मे है। लेकिन उसे महाराष्ट्रके अमरावती
जीले के सतगुरु ‘राधाकिसनजी महाराज’ने मराठी भाषा मे बडी मेहनतसे भाषांतरीत किया है।
अभी उसे गुजराथी,तथा हिंदी मे अनुवादकरने का काम हमारे रामद्वारासे शुरु है।

॥ राम राम सा॥

सतगुरू सुखरामजी महाराजकी जानकारी.

सतगुरू सुखरामजी महाराजकी जानकारी.

      ‘केवल ज्ञान विज्ञान’ यह आदिसे (जबसे सृष्टी निर्माण हुई)है।
ब्रम्हा, विष्णू, महादेव, शक्ती, शेष सब केवलका आधार लेके इस सृष्टी मे
अपना अपना कार्य पूरा कर रहे है। हर युगमे ‘आदि सतगुरू’ आते है, और यह
केवलका ज्ञान जिवोंतक पहुचाते है। उन्हे भवसागरसे निकालकर अमरलोकमे लेके
जाते है।
ऎसेही इस कलजुगमे  “आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज “राजस्थान
मे (भरतखंडमे) ‘जोधपुर’ जिलामे बिराही’ गावमे ब्राम्हण कुलमे संमत १७८३
चैत्र शुद्ध ९ गुरुवार – ४-४-१७२६  मे आये। गुरू महाराजने गर्भवासमे जनम
नही लिया, बल्की “सुखराम” नामके बालक के देहमे (जब बालकका देह छुट गया)
सतस्वरुप (अमरलोकसे) देशसे आकर प्रवेश करके देह धारण किया। गुरूमहाराजने
अखंडीतरुप से अठरा साल तक एक पत्थरपर बैठकर केवलकी भक्ती (रामनाम का
भेदसहित सुमिरण) की। नब्बे साल तक रहकर सव्वा लक्ष जीवोंको परम मोक्ष मे
लेके गये। संमत १८७३ कार्तिक शुद्ध १२ गुरुवार ३१-१०-१८१६ परम मोक्ष में
गये । अभीभी उनका सत्ता रुपसे वही कार्य शुरु है।

  ॥ राम राम सा॥

केवलकी भक्ती और आचारसंहिता

केवलकी भक्ती और आचारसंहिता

कोई भी मनुष्य जीव सतगुरू सुखरामजी महाराज को अपना निजमन देकर, निम्न दियी हुई आचारसंहिता का पालन करके विधीके अनुसार सुमिरण करेगा, तो उसके घटमे’कुद्रत कला’अवश्य प्रगट होगी,और उसके दसवे द्वार खुलकर उसके परे उसे अखंड ध्वनी सुनाई देगी।

(अ)आचार-सहिंता

(१)तबांखू,बिडी,सिगरेट,गुटखा आदि नशिली चीजोंका सेवन ना करे।
(२)मद्यपान ना करे।
(३)मांसाहार का सेवन ना करे।
(४)व्यभिचार ना करे।
(५)सहज जीवन व्यतीत करे।

(ब)भक्ती का विधी

(१)सुखासनमे बैठके रीढ्की हड्डी सीधी रखॆ,और आंखे बंद रखना है।
(२)आती-जाती सांसमे ‘राम’नाम का सुमिरण करे।
(३)सांस की कोईभी कसरत नही करना है,
(४)आती(अंदरकी)सांस मे बीस शब्द(रामनाम का)लेनेका प्रयास करना है।
शुरुमे अगर कम शब्द लिये जाते हो,तो भी कोई चिंता करनेकी आवश्यकता नही है।
(५)लेकिन सुमिरण(भजन)धारोधार करना है।
(६)हर दिन कमसे कम ७२ मिनिट भजन करना है।

सूचना:- भक्ती या विधी के बारेमे कोई भी प्रश्न हो,तो जरुर हमे संपर्क करे।

॥ रामराम सा॥

ज्ञान चर्चा

ज्ञान चर्चा

अगर हम सब सोचे तो, इस मनुष्य जीवनमे हम सब को निम्न लिखे सवाल खडे होते है।
(१) मै कौन हूँ ?
(२) मै कहासे आया हूँ ?
(३) मुझे कहाँ जाना है ? ( मेरा इस जनम मे अंतिम लक्ष्य क्या है ?
ये सब सवालोंका सही जवाब जानने के लिए पहेले हमे इस जगत की रचना ( सृष्टी रचना ) समझ लेना जरुरी है।)

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१) इस जगतमे शुरुसे दो पद चलस्से आये है।

(१) परात्परी परमात्माका ” सतस्वरुप” (२) होणकल पारब्रम्ह है।
(२) परात्परी परमात्मासे (अमरपुरुष) पहेले “प्रधान पुरुष” निर्माण किया, और वो सतलोक मे रहेने        लगा।
(३) प्रधान पुरुशसे “निरंजन” हुआ।
(४) निरंजनसे “ॐकार ” हुआ।
(५) ॐकारसे “महतत्त हुआ।
(६) महतत्तसे पाच तत्व ( आकश, वायुमंडल,अग्नी,जल,पृथ्वी ) और “शक्ति” (त्रिगुणी माया ) निर्माण हुये।
(७) शक्ती को सृष्टी निर्माण करनेका साहबसे (परमात्मासे) ह्कुम हुआ।
(८) शक्तिने पुरुषोका ध्यान किया।
(९) अंड कटाक्षसे “विष्णू” पैदा हुये।
(१०) विष्णूके नाभीसे गगनमे कमल निकला,और कमलसे “ब्रम्हा”पैदा हुये।
(११) ब्रम्हाके भृकुतीसे “शंकर”पैदा हुये।
(१२) आगे ये चारोंने (ब्रम्हा,विष्णू,महेश,शक्ती) त्रिलोक और चौंदा भुवन तैयार किये।
होणकाल पारब्रम्हकी व्याप्ती।
(अ) तीन ब्रम्ह (चिदानंद,शिवब्रम्ह,पारब्रम्ह) और तेरा लोक (महामाया,प्रकृती,ज्योती,अजर,आनंद, वजर,इखर,निरंजन,निराकार,शिव्ब्रम्ह,
महाशून्य,शुन्यसागर,परब्रम्ह)
(ब) ब्रम्हा,विष्णू,महेश,शक्ती।
(क) तीन लोक (स्वर्ग, म्रूत्यू,पातळ)और चवदा भुवन(भुर, भुवर,स्वर,महर,जन,तप,सत,तल,अतल,वितल,सुतल,तलातल,रसातल,महातल)
ओतो जीव ब्रम्ह सुण होई।
याकु पकड सके नही कोई।
सबही करम जीव इण साया।
सुख के काज जगत हुयो भाया।
ब्रम्ह ज्या सुण सुख दु:ख नाही।
लेणा एक न देना काई।
ता कारण यो खेल बनायो।
पांच भुत कर संग हुय आयो।

अर्थ
यह “जीव” तो ब्रम्ह है,इसे कोईभी पकड नही सकता।सब इस जीवकी आश्रयसे लेकीन इस जीवको कर्मका सहारा लिया है।
जब ये जीव कर्म करता है,तब कर्म बनते है। पहेले ये जीव ब्रम्हमे था। वहासे क्युं आया तो, पाम्च इंद्रियोकी (शब्द,स्पर्श,रुप,रस,गंध)
सुख की चाहणाके लिये। ब्रम्हमे तो सुख और दु:ख कुछ भी नही है। ए जीवने पांच भुत ( आकाश,वायु, अग्नी,जल,पृथ्वी) से
देह धारण करके इस संसारमे आया है।
इस विवेचनसे पहेले दो सवालोंका जबाब हमे मिल जाता है।
(१) मै ‘जीवब्रम्ह’हूँ।
(२) और मै शुरुसे पारब्रम्हसे आया हूँ।
इस संसारमे ये ‘जीव’कर्म बधंनमे अटक गया।और अपने अपने कर्मके हिसाबसे इस संसारमे सुख और दु:ख भोगने लगा,और लक्ष चौर्यासी योनीमे
जन्म-मृत्यु का(आवागमन)चक्करमे महादु:खमे फ़ंस गया।
(अ)संसारके दु:ख
(१) आधि-मनके दु:ख।
(२) व्याधि- शरीरके दु:।
(३) उपाधि-बाहरसे कुछभी सबंध न होते हुयेभी आनेवाले दु:ख।
(ब) महादु:ख
(१) आवागमन-इस जीवका लक्ष चौर्यासी योनीमे आना और जानेका भरी दु:ख।
(२) नरकवास और अगतीका दु:ख।
गर्भवासका दु:ख।
(१) गर्भमे इस जीव को उलटा लटकाया रहता है।
(२) इस जीवका मुहं गर्भमे मल/मुत्र मे डुबा हुआ रहता है।
(३) गर्भमे इस जीवको सांस लेना बडा कठीण होता है।
(४) गर्भमे चारों ओरसे इस जीवको जठराग्नीका ताप सहना पडता है।
(५)गर्भमे इस जीवको कडक बांधके रखा रहता है।
कर्म के दु:ख/महादु:ख
(१) इस जीव को सब कर्मके फ़ल भोगनेही पडते है।
(२) “यम” के हातोसे बुरीतरहसे पिटा जाता है।
जीवका महादु:ख का मुल कारण कर्मगती है,और कर्मगती तीन प्रकारकी है,(१)क्रियमाण (२)संचित(३)प्रारब्ध।

(अ) मृत्यु लोक मे ओ दु:ख भारी,मरता बार न लागे रे।
इंद्रि सुखी वे नाही पुरण,चाय बहोत घट जागे॥

(ब) गर्भवासमे करे पुकारा,सुन हो साई शिरजणहारा।
दुजा दु:ख मोये भुगतावो, गर्भवास सु बाहर लावो॥

(क) अबके बाहर करु बसेरा,निसदिन जाप करु हर तेरा।
तुम कुं भुल कबु नाही जाऊ,जे हर अब के बाहर आवू॥

(ड) ऐसा बचन गर्भके मांही,हर्सु कोल किया था याही।
हर को छोड नाही आन ध्याऊ, जे हर अब के बाहर आवू।।

(इ) इतनी हमको सुजगी,अरस परस दिल माय।
बिना भगती जुग जीव सो, नरक कुंड मे जाय॥

(फ़) ऎसा जबर काल कसाइ,तीन लोक चुन खावे।
ब्रम्हा,विष्णू,महेश्वर,शक्ती ऎ सीर ताल बजावे॥

(ग) पुनरपी जन्मम पुनरपी मरणम,पुनरपी जननी जठरेशयनम।

संतोने इस मनुष्य देहका भारी गुणभी बताया है।
(१) मनुष्य देह मिलना दुर्लभ है।(लक्ष चौर्यासी योनि भोगनेकेबाद मिलता है।)
(२) इतना दुर्लभ होनेकेबादभी क्षणभंगूर है।
(३) ७७ करोड ७६ लक्ष सांस इस जीव को मनुष्य देहमे मिली है।
(४) भारी गुण- जो भी भक्ती किया,तो उसका फ़ल मिलता है। और भक्ती संचय की जा सकती।
(५) ब्रम्हा,विष्णू,महेश,इंद्र आदि देवता इस मनुष्य देहकी चाहणा करते है।
(६) लोक – मृत्युलोक – सिर्फ़ मत्यु लोकमे ‘संत’होते है।
देह – मनुष्यदेह – “रामनाम”का संचय किया जा सकता है।
नाम – रामनाम – इस नामसे मोक्ष प्राप्ती की जा सकती।
सेवा – संतसेवा – संतोकी सेवा के बिना रामसे (परमात्मासे)स्नेह नही बनता।

देव लोकमे कारणीक देह होता है,और इसमे भक्ती संचय नही होती।

देवलोक                                                                   मृत्यू लोक
(१) कारणीक देह                                               (१) कारजीक देह
(२) सुमिरणसे भक्ती संचय नही होता।            (२)भक्ती संचय होता है।
(३) जीवका आवागमन मिट्ता नही।                (३) रामनामका सतगुरूद्वारा भेदसहीत सुमिरण करनेसे
जीवका आवागमन मिटता है, और परममोक्ष                                                                                   प्राप्त कर सकता है।

(१)भटकत भटकत निठ मिल्यो है, मानव तन अवतारा।
सुरमत देव सकल सोई बंछे, मिले न दुजी बारा॥
(२) लख चौर्यासी जुण मे,एक मिनखा देह के काज।
गूण भारी कर्तार सूँ,एसो ब्रम्ह न कोय॥
(३) जनम जनम पछ्ताव तो,मानव देही के काज।
राम सिवर सुखराम कहे,ओ अवसर हे आज॥
(४) अहो प्रभू मानव तन दिजो,भरत खंड के माहि।
केवल भक्ती करा संत सेवा, औरे करा कछु नाही॥
(५)दरिया जब लग श्वास हे,तब लग हरि गुण गाय।
जीव बटावू पावूना,क्या जाणे कद जाय॥
(६)श्वास श्वासमे नाम ले, वृथा श्वास न खोय।
न जाने इस श्वासका, आवन होय न होय॥
(७)मानव देह दुर्लभ है,मिलेहन बारंबार।
पाका फ़ल जो गिर पडे,लागे न बहु बिध डार॥
(८)तन धन जोबन देखत जासी,ज्यु बादला की छाया।
अंजली नीर ओस का पाणी, सब सपना की माया।।
(९) मृत्यू लोकमे मानवी,देव लोकमे देव।
सुखिया सब पछतावसी,भूला हरि की सेव॥
(१०)एका एकी रे,तू चल जासी।
ए कोई लार न आसी रे लो॥

इस जीव का दु:ख/महादु:ख दुरकरनेकेलिए ‘भक्ती’ करना तो अनिवार्य है।
कोईभी भक्ती निष्फ़ल नही है।

भक्तीके प्रकार और उसके फ़ल।

(अ) सगुण भक्ती :- गुणोकी(आकारोंकी) भक्ती।

(१)ब्रम्हाकी भक्ती – गायत्री मंत्र -सतलोक मे जायेगे।
(२)विष्णूकी भक्ती – नवधा भक्ती – चार मुक्ती/वैकुंठ्मे जायेंगे।
नवधा भक्ति:-(१)श्रवण (२)किर्तन(३)स्मरण(४)पादसेवा(५)पुजा
(६)अर्चन(७)दास्य(८)सख्य(९)आत्मनिवेदन
चार मुक्ती:-(१)सालोक्य(२)सामीप(३)सायुज्य(४)सारुप
(३)शंकरकी भक्ती – कैलास मे जायेंगे।
(४)शक्तीकी भक्ती – ज्योतीलोकमे जायेंगे।
[ उपर (१) से (४) तक की भक्ती कडक रहेकेही फ़ल मिलता है।]
(५)तिर्थस्नान – लक्ष चौर्यासी योनीमे रुपवान काया मिलेंगी।
(६)तपस्या – लक्ष चौर्यासी योनी भोगनेके बाद राजा होगा।
(७)यज्ञ किया -लक्ष चौर्यासी योनी भोगनेके बाद धनवान बनेगा।
(८)व्रत किया – सब योनीमे निरोगी शरीर पायेगा।
(९)भवानीका जाप -लक्ष चौर्यासी योनी भोगनेके बाद”स्त्री” का जन्म मिलेगा।
(१०)एकसो एक यज्ञ किया – इंद्र पद मिलेगा।
(११) जत,सत,तप किया – स्वर्ग लोक मे जायेंगे।
(१२)क्षेत्रपाल,भैरु,भोपाकी भक्ती – यमदूत बनेंगे।

वेद मे बताये हुये सब कर्म ‘काल’के मुखमे है।
वेद,भेद, लबेद मे संसार बंधा है।
सगुण भक्ती के बारेमे संतोने निम्न सांकी/पद मे बताया है।

(१)बेद पुराण जो या,सुण सुण कियो बिचार।
पारब्रम्ह को भेद नाही,त्रिगुण की जस लार ।१।
जोगी देख्या,जंगम देख्या,पत दर्शन बोहार।
तीन लोक मे,सब पच हारे,अंतकाल की चार ।२।
राजा देख्या,बादशाहा हो,देख्य जुग संसार।
भव सागरमे डुब रह्या रे,ताको कहां बिचार ।३।
तत्त नाव बिन कोई नही तिरिया,ना कोई तिरणे हार।
सुरगण आण उपासक सारे,देह धारसी बिस्तार ।४।
सब संतन की सायद बोले,गीता किसन बिचार।
जन सुखराम कहे जन देखी,नाव बिना हे विकार ।५।

(२)सरप मांड पुजने जावे,असल नाग क्यूं मारे।
साचा साहिब घट मे बैठा,ध्यान पत्थर को धरे॥

(३)तीन लोक लग माया हे किची,और शक्त लग भाई।
वहा लग ग्यान कथे सोई काचा,मत मानो जुग माई॥

(४) जे आ मुगत वेद पढ होवे, ब्रम्हा ध्यान धरे क्या जोवे॥

(ब)निर्गुण भक्ती :- गुणरहित(आकाररहित)भक्ती।
सोहम,जाप,अजप्पा की भक्ती,और ब्रम्ह ज्ञानकी भक्ती निर्गुणकी भक्ती है।
इस भक्तीका फ़ल पारब्रम्हतकही है।जीवोंका आवागमन नही मिटता और अमरसुख की
प्राप्ती नही होती।
(क)केवलकी भक्ती(सतस्वरुपकी भक्ती):- एक परमात्माकी भक्ती,
सतगुरूको शरण जाके “रामनाम” का भेदसहीत सुमिरण करनाही केवलकी भक्ती है।
केवलके भक्तीके फ़ल और अनुभुती।
(१)इसी जनममे और इसी देहमे खंड/पिंड/ब्रम्हांडका अनुभव होता है।
(२)घटके अंदर पुरब के छ: कमल और पक्ष्चिमके छ:कमल छेदन करके शरीरके
अंदर और दसवे द्वारके परे अखंड ध्वनी लगती है।
(३)इसी देहमे सत्ता समाधी लगती है,और ने:अक्षर(परमात्मा)की अनुभूती होती है।
(४)इसी जनममे संचित कर्म नाश हो जाते है।क्रियमाण कर्म लगते नही,और प्रारब्ध कर्म
शिथिल होते है।
(५)’काल’ के मुँहसे बाहर हो जाते है।
(६)’यम’इअसको छूता नही।
(७)आवागमन मिटता है,और अमरसुखकी(परममोक्ष)प्राप्ती।

सतगुरू किसे कहते।
(१)एकही परमात्मा की भक्ती करने को लगाता है।
(२)सिर्फ़ ‘राम’नामका भेदसहित सुमिरण करनेको बोलता है।
(३)शिष्यके घटमे (शरीरमे)ने:अक्षर प्रगट करके ‘कुद्रतकला’प्रगट कर देता है।
(४)शिष्यमे एक भी भ्रम नही रखता।

॥ चार राम॥
(१)एक राम घट घट बोले – आत्माराम(जीव)।
(२)दुजा राम दशरथ घर डोले – श्रीरामचंद्र।
(३)तिजा राम का सकल पसारा – बिंदुराम।
(४)चौथा राम सबसे न्यारा – कैवल्यराम।

॥ रामनाम का प्रताप ॥
(१)भज्यो तो राम भजी ज्योरे,हरि बिन आन तजी ज्योरे।
केवल भजिया मोख हुवेरे,करम कीट सब जाय।
आवागमन न ओतरे रे,तुम मिल्यो परमपद माय।

(२)जिण मुखमे हरिनाम,कर्म का जोर न लागे।
भुत,प्रेत,छल,छिद्र,जम दुरासु भागे।
विषय व्याध सब जाय,रोग व्यापे नही कोई।
चौरासी को काट,जीत जन निर्मल होई।
देव करे प्रणाम,बिसन ब्रम्हा शिव चाहे।
जन सुखीया निजनाम,ब्रम्ह के माहि मिलावे।

(३)राम नाम ज्योरे टंकसाल,से क्युं मरसी अकाल।
छल,छिद्र,बल,मुठ न लागे,गिरह पनोती सब उठ भागे।
नौ ग्रह जोगण राह न केत,डाकण स्यारी लागे न प्रेत।
सावण कुसावण विघ्न अनेक,राम जना नही लागे एक।
बिजासन भेरु,अरु,भुत,राम कह्या टलसी जमदूत।

(४)राम नाम की लूट है,लूट सके तो लूट।
अंतकाल पस्तावसी,जब प्राण जायेंगे छूट।

केवलकी भक्तीके बारेमे केवली संतोने कही पद/सांकी लिखी है।

(१)चार जुगा मे केवल भक्ती,मे हंस आण जगायारे।
सब हंस लेर मिलूंगा गुरुसू,आणंद पद मे भयारे।

(२)कलजुग माय कबीर,नामदेव,दादू,दरीया सोई।
वा परताप बहोत ने पायो,कहा लग कहू मै तोई।

(३)भरमावण कु से कुलजुग हे, समजावे जन बिरला।
छुछुम वेदके भेद बिनारे, सबमाया का किरला।

(४)के सुखराम समझरे प्राणी,सत्त कला ज्यां जागे।
अखंड घटमे हुवो उजियाला,नखचखमे धुन लागे।
कुदरत कला नाम इसहिको,कोई जन जाणे नाही।
करणी बिना क्रिया बिन साजन,उलट आद घर जाही।
नखचख माय अखंड धुन लागे,निमख न खंडे कोई।
मुख सु कह्या रित नही आवे,वा कुदरत सुण होई।

(५)सतगुरू,सतगुरू कह दिया,सतगुरू हुवे न कोय।
सतगुरू ना किण अंग सु,ना परचा कर होय।
ना परचा कर होय,सतगुरू ऎसा होई।
ताके भरम नही कोय,शिष निपजे सब लोई।
सुखराम नाम शिषमे जगे,से सुणसाचा होय।

(६)बांदा तीन भक्त कहू तोई।
सुर्गुण निर्गुण आणंद पद की,यारा भेद नियारा होय।
जोगारंभ जप तप सिवरण,करनी कुछ भी होइ।
तब लग निर्गुण भक्ती नाही,सुर्गण वा कहुं तोई ।१।
निर्गुण भक्त तका सुण कहिये,तत्त पीछाणे सोई।
निर्भे हुवा भ्रम सब भगा,सांसो सोग न कोई ।२।
एक निर्गुण अंग दूसरो कहीये,जे ग्यानी कोई पावे।
सोहं जाप अजपो जपको,दसवे द्वार लग जावे ।३।
ए निर्गुण मे मिले न कोई,जायर देखे सारा।
करामात कळा कोई पावे,ब्रम्ह न हुवे बिचारा ।४।
आनंद पद की भक्ती बताऊँ,प्रथम तो मत आवे।
ग्यान,ध्यान हद का गुरु सारा,से सब ही छीटकावे ।५।
सत्तगुरु ढुंढ सरण ले जाई,जहाँ नाव कळा घट जागे।
राज जोगवो कहिये जगमे,बिन करणी धुन्न लागे ।६।
फ़ाड र पीठ चढे आकासा,फ़क्त हंस लियो।
काया पांच संग जीव रेतो,सो अब न्यारो कीयो ।७।
आणद पद की सत्ता कहीये जे,इन संग जो जन होई।
ओर जग अटके दरवाजे,ओ नही अटके कोई ।८।
राज जोग ओ कहीये भाई,ओर जोग सब लोई।
बादस्याह पास रेत नही पहुंचे, भूप मीले कहूं तोई ।९।
दरवाजा ऊला सब खुल्ले,बरज पोल लग सोई।
राज जोग बिन दसवो कहीये,सो नही खुले कोई ।१०।
के सुखराम भेद बिन जोगी,जे आस करे सब जावे।
दरवाजे सु सब जोग फ़िरिया,आगे जाण न पावे ।११।

इस तीन भक्तीसे मालूम हुआ है की, हमे अपना संसारका दु:ख और
महादु:ख(आवागमन)मिटाकर अमरसुख(परममोक्ष)प्राप्त करना है। ये सिर्फ़
केवलकी भक्तीसेही मिलनेवाला है। इसलिए तिसरा सवाल जो शुरुमे किया है,
उसका जवाब अब हमे म्मलूम हो गया, और वो है ,”हमे अमर सुख प्राप्त
करनेके लिए अमरलोक(सत्स्वरुप क देश)मे जाना है।”

 

॥रामराम सा॥

हमारे उपक्रम

हमारे उपक्रम

(१) कैवल्य ज्ञान विज्ञान सत्संग,रामद्वारा जलगांव यह हररोज
सुबह ५.०० बजे से रात १०.०० बजे तक खुला रहता है।
(२) यहा हरदिन पुराने संत अपने समय के अनुसार भजन करते है।
(३) यहा नये आये हुये संतोंके साथ ज्ञान-चर्चा की जाती है,और
भजनकी विधी,तथा आचारसंहिता समझायी जाती है।
(४)यहा हर इतवार के दिन शाम को ६.०० से ८.३० तक
सतगुरू सुखरामजी महाराज की बाणीजी पर सत्संग लिया जाता है।
(५)यहा हर माह कें आखरी शनिवार के दिन सुबह ५.०० से रात १०.०० तक अखंड
भजनका भी आयोजन किया जाता है।
(६)यहा कुछ इच्छुक पुराने संतोंको नये संतोको ज्ञानचर्चा करनेका भी
अध्ययन दिया जाता है।
(७)यहाके कही पुराने संतोंके घर एक दिनका अखंड भजन/पद गायन का
सत्संग आयोजित किया जाता है।
(८)यहा के रामद्वाराने महाराष्ट्र मे कही जगह छोटे रामद्वारा संचलीत किये है,और
इन सबको मार्गदर्शित किया जाता है।
(९) बाहरसे कही जगहसे आनेवाले नये संतोंको ज्ञान दिया जाता है।
(१०) बाहरसे कही जगहसे पुराने संतोंसे फ़ोनद्वारा पुछे गये प्रश्नोंका खुलासा किया जाता है।
(११) आदि सतगुरू सुखरामजी महाराजजीके देह के जन्मदिन और परम मोक्ष दिन के अवसरपर            हरसाल सतसंग,   भजन,ज्ञानचर्चा और महाप्रसाद का आयोजन किया जाता है।

॥रामराम सा॥

केवली संतों की जानकारी

केवली संतोंकी जानकारी

इस भरत खंडमे कही केवली संत हुये है। उनमेसे कुछ संतोंकी जानकरी नीचे दिई है।

(१)दर्याजी साहेब – राज्यस्थान (भारत)
(२)कबीर साहेब – उत्तरप्रदेश (भारत)
(३)नामदेव साहेब – महाराष्ट्र (भारत)
(४)दादू साहेब – राज्यस्थान (भारत)
(५)राकाजी साहेब – महाराष्ट्र (भारत)
(६)नानक साहेब – पंजाब (भारत)
(७)पिपाजी साहेब – राज्यस्थान (भारत)

॥रामराम सा॥