आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज का जीव गर्भ में से नहीं आय था। उनके जीव ने सुखराम नाम के बालक के देह में ( जब बालक का देह छूट गया ) तब सतस्वरूप (अमरदेश) से आकर प्रवेश करके देह धारण किया।
हर युग में आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज आते है और सतस्वरूप परमात्मा का ज्ञान जीवों तक पहुँचाते है। उन्हें ज्ञान देकर काल के महादुःख से निकालकर सदा के लिए महासुख के अमरलोक में लेके जाते है। ऐसेही इस कलियुग में आदि सतगुरू सुखरामजी महाराज राजस्थान में जिला जोधपूर बिराही गाँव में, ब्राम्हण कुल में समंत १७१८ चेत शुद्ध ९ गुरुवार, पुष्य नक्षत्र, तारीख ४-४-१७२६ को आये।
आदि सतगुरू सुखरामजी महाराजने ब्राम्हण कुल में आनेपर भी ब्राम्हण के एक भी कर्मकांड नहीं किये थे और अखंडीत रूप से अठारह सालतक एक पत्थर पर बैठकर सतस्वरूप परमात्मा की भक्ति (राम नाम का सुमिरन) किया।
नब्बे साल तक रहकर सव्वा लाख जीवोंको परम मोक्ष मे लेके गये।